-आरिफ परवाज़
भारत में चुनावी ब्युगल बज
चूका है, सभी दलो ने कमर कस ली है, चुनावी जंग शुरू हो चुकी है , जो सत्ता में है
उन्हें सत्ता खोने का डर है और जो विपक्ष में है उसे सत्ता में आते आते चुक जाने का खौफ है, २०१४
के चुनाव की ख़ास बात ये है की, इस बार मीडिया तथा सोश्यल मीडिया पहले के मुकाबले
ज्यादा मज़बूत और प्रभावशाली है, ज़्यादातर लोग हालिया हुकूमत से बेज़ार है. विपक्ष
का फ़ासीवादी समजा जानेवाला उमीदवार प्रधानमंत्री पद का दावेदार है, जो की सन २००२
में हजारो भारतीय नागरिक की मौत का जिम्मेदार हैं ! जिसे देश के बड़े उद्योगपति,
मीडिया और उच्चवर्णीय, उच्चवर्गीय समाज का
समर्थन मिलता दिख रहा है. देश का सेक्युलर तानाबाना खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा
है, मुज़फ्फरनगर के दंगो से मुस्लिम समाज सकते में हैं, आहत है और खुद को ठगा हुआ
महसूस कर रहा है, कई सियासी पार्टिया मुसलमानों को लुभावने वादे करती दिखाई पड़ रही
है, कई दल तो मोदी के जितने का डर बताकर मुसलमानों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर
रहे हैं. इस सब माहोल में इस देश का मुसलमान क्या सोच रहा है, क्या चल रहा है उस
के मन में ?
क्या एक शख्श के
प्रधानमंत्री बन जाने से, किसी एक पार्टी के सत्ता में आ जाने से भारत के
मुसलमानों का वुजूद खतरे में आ जायेगा ??? क्या इतनी कमज़ोर हैं हमारी जड़ें ???
क्या इतने खोखले हैं भारत में मुसलमानों की विरासत के दावे ???
में यहाँ पर एक बात साफ़ कर
देना चाहता हु की, ना में मोदी का समर्थक हु और ना ही बीजेपी या आरएसएस का, बल्कि
में उनकी विचारधारा का खुला आलोचक हु ! में यहाँ एक बात और कहता चलू के मुसलमानों
को मोदी या उनकी पार्टी से डरने की कोई ज़रुरत नहीं हैं. हम सब को ये डर की राजनीती
से उबरना पड़ेगा जो की मुसलमानों के पिछड़ेपन की एहम वजह हैं . और बार बार ज्यादातर राजनितिक
दल इसी डर की राजनीती का खेल खेल कर गरीबी, मोहताजी, जिल्लत और पिछड़ेपन के कभी ना
टूटने वाले चक्कर में मुसलमानों को फ़साये रखना चाहते हैं. लेकिन अब की बार हमे इस
डर की राजनीती को समजना पड़ेगा और इस चक्कर से निकलना पड़ेगा . ये सिर्फ मुसलमानों
के लिए ही नहीं बल्कि भारत देश के लिए भी
महत्वपूर्ण हैं. क्योंकि हम भारतीय मुसलमान हैं जिनको पाकिस्तान जाना था वो
चले गए हम भारत में बसने वाला दूसरा बहुसंख्यक समाज हैं. जी हाँ मौलाना अबुल कलाम
आजाद ने भी यही कहा था की मुसलमान इस मुल्क में अल्पसंख्यक नहीं बल्कि दूसरा सबसे
बड़ा बहुसंख्यक समाज हैं.
मुसलमानों को सही मायने में प्रगति करनी है तो उसे
“अल्पसंख्यक वाली “ “लाचारी और कमजोरी वाली” मानसिकता से निकलना पड़ेगा. खुद को एक
बड़े आयाम में देखना पड़ेगा जहा हम मुसलमान तो है ही साथ साथ हमारी और भी पहचान है,
जिसे हमे समजना होगा अपनी भारतीय पहचान को मज़बूत बनाना होगा, क्योंकि हमारे भी
ज्यादातर वोही मसाइल है जोकि औरो के हैं,
क्या हमे अच्छी शिक्षा की ज़रुरत नहीं ? क्या हमे बेहतर इलाज मुहैया नहीं
होना चाहिए ? क्या महंगाई से मुसलमान परेशां नहीं हैं? क्या बिजली सड़क पानी का वो
गरजमंद नहीं हैं ? क्या रोजगार के मौके मुसलमानों को मय्यसर नहीं होने चाहिए ?
........जब ये सारे सवाल औरो की तरह हमारे भी हैं तो क्यों कोई हमे अलग कर के देखे
? और क्यों हम खुद को औरो से अलग कर के देखे ?
माना की सरकारी नौकरी में
मुसलमान कम है, देश की संसद और विधानसभा में मुसलमान कम हैं, और जो है उनमें
अधिकतर नाकारा हैं,माना की भारत की जेले मुसलमानों से लबालब हैं, जहा अब भी हजारो
मुसलमान नोजवानो की जवानी जाया जा रही हैं. माना की दंगो में सबसे ज्यादा मार भी
मुसलमानही खाता हैं, और फिर दंगे करवाने
के इलज़ाम भी उसी के सर आता हैं, माना की भारत के शहरो के कई इलाको में मुसलमानों
को घर मिलना नामुमकिन सा हैं, कही पर भी बम फट ता है तो सब मुसलमानों को ही
ज़िम्मेदार ठेहराते हैं.....कई लोग मुसलमानों को आतंकवादी समजते हैं, जी हा माना की
मुसलमानों पर ज्यादती होती हैं फिर
भी........
जी हा फिर भी हमे इस
“अल्पसंख्यक वाली “ “लाचारी और कमजोरी वाली” मानसिकता से निकलना पड़ेगा......क्यों
की ये ज्यादती तो औरो के साथ भी हो रही हैं ? क्या आदिवासी इससे अछुता हैं? क्या
उत्तर पूर्वी भारत में रहनेवालो के साथ भेदभाव नहीं होता ? क्या बेकसूर आदिवासी और दलित “माओवादी” होने के
आरोप में इस देश की जेलों में गुमनाम ज़िन्दगी नहीं जी रहें ? क्या दलितों पर
सदियों से हो रहा अत्याचार ख़तम हो गया ? किसी को अपनी ज़ात की वजह से निचले दर्जे का
माना जाये ये सुन कर आप का दिल काँप नहीं
उठता ? क्या ये इंसानियत के खिलाफ जुल्म नहीं है ?
हमे सही मायने में तरक्की
करनी हैं तो, अपने साथ साथ और मजलूम तबके के का साथ हम को देना होगा, जब किसी दलित
या आदिवासी के साथ ज़ुल्म होता हैं तो हमे भी उसके साथ खड़े होकर, उसके इन्साफ के
लिए गुहार लगानी होगी, देश के बाकि एहम सवालो पर बाकि देशवासी के साथ मिलकर अपनी
आवाज़ को बुलन्द करना होगा. हम इस देश के नागरिक हैं हमारे पुरखो ने भी भारत की आज़ादी के लिए अपना खून कुर्बान किया
हें, हमे बार बार अपनी देश भक्ति का सबूत देने कोई ज़रुरत नहीं ये हमारा हक हैं की
इस देश को चलाने में, इसे आगे बढाने में, इस की
तरक्की में खुशहाली में मुसलमानों की भी बराबर साझेदारी हो !
मुसलमानों को ना मोदी की
फ़ासीवादी विचारधरा का समर्थन करना चाहिए और नहीं उन लोगो का जो मुसलमानों को मोदी
से डरा रहे हैं, मुसलमानों को अपनी सही सूझ-बुझ से अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना
होगा. मुसलमान किसी एक पार्टी का गुलाम
नहीं जो किसी से डर के, किसी एक पार्टी को खुद के ऊपर काबिज होने का मौका दे और
गरीबी, मोहताजी, जिल्लत और पिछड़ेपन के चक्कर में फसा रहे. भारत का ज़्यादातर हिन्दू
समाज सेक्युलर हैं और सभी के साथ मिलकर रहना चाहता हैं. जिस तरह कोई मंदिर का
पुजारी या पंडित भारत के आम हिन्दुओ का राजनितिक प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता उसी
तरह जो दिखावे के मज़हबी रहनुमा मुसलमानों की सियासी नुमाइंदगी करने का दावा करते
हैं, वो मुल्ला मुसलमानों का सियासी नुमाइंदा
नहीं है बल्कि इन्ही मुल्लाओं ने मुस्लिम समाज को आपस में बाँट रखा हैं और यही लोग
मुसलमानों के पिछड़ेपन के ज़िम्मेदार भी हैं , सभी पार्टी वालो को अपने पास मुसलमान
तो चाहिये, लेकिन उनके इशारे पर नाचनेवाला, गरीब गाय बनकर, बेचारा बनकर, रहने
वाला, नाकि अपनी सोच रखने, सुझभुज रखनेवाला और प्रगतिशील विचारवाला, उन को सिर्फ़ ढाढ़ी-टोपी पहने सिर्फ दिखावे के लिए मुसलमान
चाहिए, ऐसी पार्टी को नकार ने का वक़्त आ गया हैं, सवाल करने का वक़्त आ गया है,
जवाब मांगने का वक़्त आ गया हैं, बदलने का वक़्त आ गया है ! खुदा भी उनकी कोई मदद
नहीं करता जो अपनी मदद खुद न करे, मुसलमानों को भारतीय संविधान पर पूरा भरोसा रख
कर सभी के साथ मिलकर लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकार के लिए बिना
डरे जद्दोजहद करनी होगी. ज़रुरत पड़ने रास्ते पर उतरना होगा, गाँधी, आंबेडकर और
मौलना आजाद के आदर्श को सामने रख कर अपना संघर्ष खड़ा करना होगा. इस्लाम को
प्रगतिशील परिपेक्ष में समजना होगा ! इस्लाम के अमन इन्साफ और मोहब्बत के पैगाम को
अपनी ज़िन्दगी में ढालना होगा !
अब वक़्त आ गया है की
प्रगतिशील मुस्लिम महिला और पुरुष नौजवान आगे आये और अपनी बागडोर खुद संभाले, देश
में हो रहे बदलाव में अपना नेतृत्व करे, और इस देश के निर्माण में अपना योगदान दे
! हमे कोई मसीहा नहीं चाहिए, हम गैरतमंद लोग हैं, हम मदद करेंगे खुद की भी औरों की
भी.........तुम्हारी भीख नहीं चाहिए, हम चाहते हैं हमारा बराबरी का हक, हम चाहते
हैं इन्साफ ......इज्ज़त से .....सम्मान से
! मुसलमानों का वोट इन्साफ को ...साझेदारी को.... सम्मान को !
लेखक : आरिफ परवाज़, इमेल : arifparvaz@gmail.com, ०९२२४४१२०२२
1 comment:
good. When we struggle to deepen democracy, it is not only Muslims we should look towards. we should look towards all Indians as Indians.
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