Friday, November 23, 2007

ज़िंदगी तो सभी जीते है ! ज़िंदगी हम भी जियेंगे !

मगर कैसी ............?

क्या हमारे जीवन का इंधन दूसरो कि मौत होगा ?

या हम उनकी तरह जियेंगे

जो सबकुछ देखकर भी अंधे हैं !

या उनकी तरह जो सबकुछ सुनकर भी बहरें हैं !

या हमारा जीवन दीप एक और दिया जलाएगा !

इस रोशन अँधेरी दुनिया में ज़रा सा उजियारा फैलाएगा !

फैसला हमारे हाथ में हैं .......

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